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क्यू नींद मेरी मुझसे ख़फ़ा सी हैं?

“क्यू नींद मेरी मुझसे ख़फ़ा सी हैं,

क्यू हर पल एक डर सा हैं,

क्यू नींद में मीठे सपने नही,

क्यू मेरी नींद में एक बेफ़िक्र खामोशी नही,

क्यू ख़फ़ा- ख़फ़ा सी हूँ मैं ख़ुद से , अंजान सी , अकेली सी .. ख़ुद के हीं ख़्याल में उलझी सी”

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1 thought on “क्यू नींद मेरी मुझसे ख़फ़ा सी हैं?”

  1. nikhil goyal says:

    Lines by a legendary writer

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